विवाह और प्रेम: एक बदलते ज़माने की बात
आज के दौर में विवाह को लेकर कई भ्रांतियाँ हैं, जिनसे बाहर निकलना ज़रूरी है। सबसे पहले तो यह समझना होगा कि विवाह कोई ज़रूरी पड़ाव नहीं है। यह एक व्यक्तिगत पसंद है, न कि जीवन की अनिवार्यता। आज दुनिया भर में लोग विवाह न करने, शादी के बाद अलग होने, आपसी सहमति से बिना बच्चों के वैवाहिक जीवन जीने, या फिर लंबी उम्र तक अविवाहित रहने का रास्ता चुन रहे हैं। पुरुष और महिला, दोनों ही इस बदलाव का हिस्सा हैं। समय बहुत बदल चुका है।
शहरी समाज में अब 22-24 साल की उम्र में शादी करने पर तारीफ़ कम, आश्चर्य ज़्यादा होता है। वैवाहिक जीवन से जुड़ी परेशानियाँ, असफल रिश्तों की ख़बरें, और टूटते परिवारों की कहानियाँ सुनकर लोग अब शादी को लेकर उत्साहित कम, डरे हुए ज़्यादा हैं। मेरा मानना है कि या तो विवाह की यह पुरानी व्यवस्था पूरी तरह बदलेगी, इसका रूप-रंग नया होगा, या फिर अगले कुछ दशकों में यह प्रथा ख़त्म हो जाएगी। और अगर यह नहीं बदली, तो शायद इसे ख़त्म हो जाना ही बेहतर है।
विवाह का एकमात्र आधार प्रेम होना चाहिए, और प्रेम तो नसीब वालों को मिलता है। बचपन के प्यार को विवाह तक ले जाकर जीवन भर साथ निभाने वाले लोग बेहद भाग्यशाली होते हैं। वे भी, जिन्हें ज़िंदगी में देर से ही सही, सच्चा प्यार नसीब होता है। प्रेम के लिए सिर्फ़ नसीब चाहिए। आप ख़ुद को इसके काबिल बनाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन फिर भी बहुत कुछ आपके हाथ में नहीं होता। समाज, अर्थव्यवस्था, या कोई क्रांति—इनका प्रेम से कोई लेना-देना नहीं। मैंने बेहद प्रतिभाशाली और नेक लोगों को प्यार के लिए तरसते देखा है। आप कितने ही अच्छे क्यों न हों, कितना ही प्रयास क्यों न करें, अगर प्यार नसीब में नहीं, तो नहीं मिलता। और अगर मिलना होता है, तो अचानक मिल जाता है—ऐसे कि आप हैरान रह जाते हैं!
सच्चा, निस्वार्थ, गहरा और लंबे समय तक साथ निभाने वाला प्रेम इस दुनिया की सबसे अनमोल चीज़ है। आप इसके लिए प्रार्थना कर सकते हैं, ख़ुद को बेहतर इंसान बनाकर तैयार कर सकते हैं। हालाँकि प्रेम किसी की पात्रता का मोहताज नहीं, फिर भी अगर आप सुपात्र हैं, तो शायद यह आपके पास आकर ठहर जाए।
क्यों किसी को प्रेम मिलता है और किसी को नहीं, इसका कोई तर्क नहीं। यह दुनिया बेतरतीब है। लेकिन अगर प्रेम न भी मिले, तो भी ज़िंदगी में बहुत कुछ है—कला, दोस्त, परिवार, आपका जुनून, और न जाने क्या-क्या। यह दुनिया एक खिला हुआ गुलाब है, और जीवित होना अपने आप में एक आशीर्वाद। न शादी के लिए रोइए, न प्रेम के लिए। जो होना होगा, होगा। और अगर नहीं हुआ, तो कम से कम दूसरों की ज़िंदगी को दुख न दें।
जिनका विवाह उनकी मर्ज़ी, प्यार और ख़ुशी से होता है, उनके लिए यह अनमोल तोहफ़ा है। लेकिन ऐसे लोग कम ही हैं। आज बहुत से लोग अकेले रहना पसंद कर रहे हैं और पूरे सम्मान और ख़ुशी के साथ अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं। उनमें कोई कमी का एहसास नहीं। ग़लत रिश्ते में बंधने से बेहतर है अकेले रहना। हिंसा से बड़ा कोई अपराध नहीं। जिसके साथ रहें, उसे फूलों की तरह संभालें। प्यार इतना हो कि उस पर कभी उँगली भी न उठे, खरोंच भी न आए। तभी रिश्ते का मतलब है। वरना अकेले रहें। समाज में ऐसे कई लोग हैं जो अकेले हैं, और फिर भी ख़ुश हैं
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