मेरा सफर: गाँव से दिल्ली की जिद
हाय दोस्तों,
मेरा नाम जयप्रकाश है, और मैं मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के एक छोटे से गाँव से हूँ। इस ब्लॉग "मेरा सफर और ज़िंदगी" में मैं आपको अपनी कहानी सुनाने जा रहा हूँ—वो स्ट्रगल और वो जिद जो मुझे यहाँ तक लाई। आपने मेरी स्कूल वाली कहानी पढ़ी होगी, पर असली सफर शुरू हुआ 12वीं के बाद।
12वीं के बाद ग्रेजुएशन शुरू किया, पर हालात ऐसे बने कि वो पूरा नहीं हुआ। फिर कॉरेस्पॉन्डेंस से कोशिश की—पहला साल निकला, पर दूसरा साल छूट गया। गाँव में नौकरी नहीं थी, घर की हालत ठीक नहीं थी। मैं मामा के यहाँ रहता था, जिन्होंने 12वीं तक मेरा खर्च उठाया। सोचा था कि आगे भी साथ देंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। पढ़ाई छूटी, और मैं रोज़गार को लेकर परेशान था।
इसी बीच गाँव में एक लड़का मिला—राहुल। वो दिल्ली में काम करता था और छुट्टियों में गाँव आया था। मैंने उससे कहा, "भाई, मुझे भी कोई काम ढूँढ दे, मैं तेरे साथ दिल्ली चलूँगा।" उसने हाँ कर दी। प्लान बना कि अगले संडे को हम साथ जाएँगे। पर संडे से एक दिन पहले पता चला—राहुल सुबह ही अकेले चला गया। धोखा सा लगा, उसने वादा किया था कि मुझे ले जाएगा। फिर मैंने जिद ठान ली—"अकेले ही जाऊँगा!"
घर में किसी को नहीं बताया। एक थैला तैयार किया—दो जोड़ी कपड़े, मेरे पास 300 रुपये थे, और थोड़े पैसे मम्मी से लिए। उन्हें बोला, "मैं मामा के यहाँ जा रहा हूँ," पर मैं मामा के यहाँ नहीं गया। अगस्त 2006 का वो संडे था—मैं घर से कटनी पहुँचा, वहाँ से ट्रेन पकड़ी, और दिल्ली चला गया।
वो ट्रेन का सफर और दिल्ली पहुँचने की कहानी अगली बार बताऊँगा। तुम बताओ—कभी तुमने भी घर से बिना बताए कोई बड़ा कदम उठाया? अपनी कहानी सुनाओ!
आपका दोस्त,
जयप्रकाश

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