नाइंथ की टाट पट्टी वाली जंग

दोस्तों,
आज एक ऐसी कहानी सुनाता हूँ, जो मेरे स्कूल के दिनों की है—नाइंथ क्लास, गवर्नमेंट स्कूल की वो मस्ती, जो कभी भूलती नहीं। क्रिकेट का जुनून तो था ही, पर कभी-कभी छोटी सी बात भी फिल्मी ड्रामे में बदल जाती थी। हमारे स्कूल में बेंच-डेस्क का तो सपना ही था—हम नीचे टाट पट्टी पर बैठते थे। वो मोटी सी चटाई, जो स्कूल देता था, पर दिक्कत ये थी कि हर क्लास के लड़के अच्छी वाली टाट पट्टी ले उड़ते थे, और हमें फटी-सड़ी छोड़ जाते थे।

एक दिन क्लास में घुसा तो देखा—हमारी टाट पट्टी गायब! बस एक पुरानी, बदबूदार चटाई पड़ी थी, जिसे देखकर लगता था कि ये पिछले ज़माने की है। दोस्तों से पूछा, "अरे, हमारी वाली कहाँ गई?" जवाब मिला, "नाइंथ का ही एक लड़का आया था, हमारी अच्छी टाट पट्टी उठाकर अपनी क्लास में ले गया।" बस, मेरा खून खौल गया। दोस्तों ने आग में घी डाला, "भाई, हम सीनियर हैं, ये जूनियर हमारी चीज़ कैसे ले जा सकता है? जाकर हिसाब करो!"

अब गुस्सा दिमाग पर चढ़ा, तो मैं उसकी क्लास में घुस गया। उसे ढूंढा, सामने खड़ा किया, और बिना कुछ बोले—धड़ाम! एक ज़ोरदार थप्पड़ उसके मुँह पर जड़ दिया। उसकी तो फट गई, होंठ से खून टपकने लगा। वो हक्का-बक्का मुझे देखता रहा, और मैंने उससे हमारी टाट पट्टी छीन ली। वापस अपनी क्लास में आया, चटाई बिछाई, और दोस्तों के साथ बैठकर तालियाँ बजाईं—जैसे कोई जंग जीत ली हो!

पर भाई, गुस्सा ठंडा हुआ तो डर शुरू हो गया। सोचने लगा, "कहीं ये शिकायत न कर दे, या स्कूल के बाहर गैंग लेकर पीछे न पड़ जाए।" क्लास में तो टीचर थे, कुछ नहीं हुआ। पर स्कूल खत्म होने का टाइम पास आते ही दिल धक-धक करने लगा। घर 5 किलोमीटर दूर था, और उस लड़के का घर मेरे रास्ते में पड़ता था। सोचा, "अगर रास्ते में घेर लिया तो साइकिल समेत धुनाई हो जाएगी।"

फिर दोस्तों ने प्लान बनाया— "भाई, तुझे अकेले नहीं छोड़ेंगे।" स्कूल खत्म हुआ, और सारे यारों ने मिलकर मुझे साइकिल से उसके घर तक छोड़ा। रास्ते में वो लड़का दूर से दिखा, पर हमारे ग्रुप को देखकर चुपचाप सरक लिया। वहाँ से पार करके मैं घर पहुँचा। मामा को सारी कहानी सुनाई। डाँट तो पड़ी—"ये क्या तमाशा कर रखा है?"—पर फिर बोले, "ठीक है, कुछ होगा तो देख लेंगे।" शुक्र था, वो लड़ाई आगे नहीं बढ़ी, वरना नाइंथ में ही स्कूल छूट जाता!

तो दोस्तों, ये थी मेरे सफर की एक छोटी सी जंग—टाट पट्टी के लिए लड़ी गई। अब तुम बताओ—तुम्हारे स्कूल में ऐसी कोई मारपीट हुई? दोस्तों ने कभी ऐसे बचाया? और एक सवाल—क्या तुम भी टाट पट्टी पर बैठे, या डेस्क-बेंच की ठसक थी? सरकारी स्कूल की मस्ती जिए, या प्राइवेट स्कूल की शान देखी? अपनी कहानी सुनाओ, यार!

आपका दोस्त,
JP

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