गाँव से दिल्ली: ट्रेन, भीड़ और एक अनजान शहर का डर
वो अगस्त 2006 की सुबह थी, जब मैं गाँव से कटनी के लिए बस में चढ़ा। खिड़की से बाहर देख रहा था, पर दिमाग में सवालों का तूफान—आगे क्या होगा? कटनी तक तो सब ठीक था, वहाँ की गलियाँ, बाजार, सब जाना-पहचाना। पर दिल्ली? वो तो मेरे लिए किसी अनजान दुनिया जैसी थी। ट्रेन का नाम सुना था, शायद बचपन में एक बार किसी के साथ चढ़ा भी था, पर वो अनुभव तो धुंधला सा था। अब अकेले? मन में घबराहट थी, पर एक जिद भी—जाना तो है, कुछ तो बनेगा!
कटनी स्टेशन पहुँचा तो लगा जैसे कोई मेला लग गया हो। भीड़ का शोर, कुलियों की चिल्लाहट, और चाय वालों की "चाय-चाय" की पुकार। मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था—टिकट कहाँ से लूँ, ट्रेन कहाँ मिलेगी? किसी तरह धक्के खाते-खिलाते टिकट काउंटर तक पहुँचा। काउंटर वाले भैया को बोला, "दिल्ली की टिकट दे दो।" वो थोड़ा गुस्से में बोले, "कौन सा स्टेशन? नई दिल्ली, हजरत निज़ामुद्दीन, पुरानी दिल्ली?" मैं तो खामोश। मुझे क्या पता दिल्ली में इतने सारे स्टेशन होते हैं! फिर शायद उन्हें मुझ पर तरस आ गया। बोले, "ये ले, गोंडवाना एक्सप्रेस, हजरत निज़ामुद्दीन जायेगी।" मैंने टिकट पकड़ा और सोचा—बस, अब ट्रेन में चढ़ जाऊँ, फिर देखा जाएगा।
टिकट थी जनरल डिब्बे की, क्योंकि जेब में पैसे गिन-गिनकर खर्च करने थे। ट्रेन का इंतज़ार करते वक्त स्टेशन की बेंच पर बैठा, तो डर और उत्साह दोनों दिल में कुश्ती लड़ रहे थे। बड़ा शहर, नए लोग, नया काम—सब अनजान। मैं वैसे भी कम बोलने वाला, किसी से जल्दी घुलता-मिलता नहीं। ऊपर से ट्रेन में चोरी की कहानियाँ सुन रखी थीं—सामान संभालो, वरना उड़ जाएगा! बैग को सीने से चिपकाए बैठा, जैसे कोई खजाना हो।
ट्रेन आई तो ऐसा लगा जैसे आधा हिंदुस्तान उसमें सवार होने की जंग लड़ रहा हो। धक्का-मुक्की, चिल्ल-पों—किसी तरह अंदर घुसा। सीट? अरे, वो तो सपने की बात थी। खचाखच भरे डिब्बे में एक कोने में जगह बनाई, बैग नीचे दबाकर बैठ गया। खाने में माँ की दी हुई रोटी-सब्जी दिन में खा चुका था। स्टेशन से बिस्किट का एक पैकेट खरीदा था, वही रात को चबाया। साथ में बैठे एक अंकल ने अपनी टिफिन खोली, तो गंध ऐसी कि पेट में चूहे दौड़ने लगे। वो हँसकर बोले, "खा ले, बेटा।" मैंने शरमाते हुए एक रोटी ली और खा ली।
रात को ट्रेन की खट-खट और खिड़की से आती ठंडी हवा के बीच सोचने लगा—दिल्ली में क्या होगा? मेरा दोस्त सुनील, जिसने कहा था कि वो लाजपत नगर में रहता है, वो मिलेगा या नहीं? काम मिलेगा या नहीं? इन्हीं सवालों में उलझा रहा। फिर थकान ने आँखें बंद कर दीं। रात को अचानक नींद खुली—बाथरूम जाना था। पर भीड़ इतनी कि बाथरूम तक पहुँचना किसी जंग से कम नहीं। सीट छोड़ूँ तो कोई और कब्जा कर ले, सामान उठा ले जाए—ये डर अलग। आधा घंटा सोचा, फिर हिम्मत करके उठा। लोगों के पैरों पर पैर रखते, धक्के खाते, किसी तरह बाथरूम तक पहुँचा। वहाँ भी लाइन! दस मिनट और लगे दरवाजा खुलने में। वापस सीट पर आया तो पसीने-पसीने।
सुबह छह-सात बजे ट्रेन हजरत निज़ामुद्दीन स्टेशन पर रुकी। स्टेशन देखकर मेरे होश उड़ गए। इतना बड़ा, इतनी भीड़, इतना शोर—लगा मैं किसी दूसरी दुनिया में आ गया। अब क्या? कहाँ जाऊँ? सुनील ने एक बार बातों-बातों में बताया था कि वो लाजपत नगर में रहता है। मुझे लगा शायद पास ही होगा। स्टेशन से बाहर निकला तो ऑटो वालों की भीड़— "कहाँ जाना है, भैया? चलो, बैठो!" मुझे तो कुछ समझ नहीं आया। किसी से पूछा, "बस स्टैंड कहाँ है?" वो बोला, "आगे चलो, मिल जाएगा।" पैदल-पैदल बस स्टैंड पहुँचा। एक कंडक्टर से पूछा, "लाजपत नगर की बस?" उसने एक बस दिखाई, मैं चढ़ गया।
अगस्त की बारिश शुरू थी। बस में भीड़ ऐसी कि साँस लेना मुश्किल। कंडक्टर को बोला, "लाजपत नगर उतार देना।" पर दिल्ली की बसों का हाल तो सब जानते हैं—न उतरने की जगह, न सुनने की फुर्सत। लाजपत नगर का स्टॉप निकल गया, और मैं अगले स्टॉप पर उतरा। कंडक्टर बोला, "अरे, लाजपत नगर तो पीछे रह गया!" मैं खड़ा रहा—चारों तरफ अनजान चेहरे, बारिश की बूंदें, और मन में एक ही सवाल—अब क्या?

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